उत्तर प्रदेश के रेशम निदेशक आनंद कुमार शुक्ला ने किया सहसपुर स्थित रेशम अनुसंधान केंद्र का तकनीकी भ्रमण
उत्तर प्रदेश के रेशम निदेशक आनंद कुमार शुक्ला ने किया सहसपुर स्थित रेशम अनुसंधान केंद्र का तकनीकी भ्रमण
रेशम उत्पादन तकनीकों और किसानों की आय बढ़ाने के लिए किए जा रहे नवाचारों का लिया जायजा
देहरादून। उत्तर प्रदेश के रेशम निदेशक आनंद कुमार शुक्ला ने देहरादून के सहसपुर स्थित क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र का तकनीकी भ्रमण कर केंद्र में संचालित अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों का अवलोकन किया। इस दौरान उन्होंने रेशम उत्पादन की आधुनिक तकनीकों, वैज्ञानिक विधियों और रेशम उत्पादकों की उत्पादकता एवं आय में वृद्धि के लिए किए जा रहे तकनीकी नवाचारों की जानकारी ली।
भ्रमण के दौरान केंद्र प्रभारी डॉ. पवन सैनी ने केंद्र में संचालित विभिन्न गतिविधियों से निदेशक को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि केंद्र में स्थापित कीटपालन गृह की क्षमता लगभग 100 डीएफएल (Disease Free Layings) के पालन की है। इस कीटपालन गृह का उद्देश्य सीमित संसाधनों में वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से रेशमकीट पालन को बढ़ावा देना तथा इसकी उपयोगिता, कार्यक्षमता और तकनीकी व्यवहार्यता को प्रदर्शित करना है।
केंद्र प्रभारी ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के सहयोग से संचालित परियोजना “उत्तराखंड में राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे शहतूत वृक्षारोपण का विकास” की भी विस्तृत जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि यह परियोजना वर्तमान में तीन राजमार्ग खंडों पर संचालित की जा रही है। इनमें राष्ट्रीय राजमार्ग-72ए/73 (रुड़की), राष्ट्रीय राजमार्ग-74 (नजीबाबाद) तथा राष्ट्रीय राजमार्ग-125 (सितारगंज–खटीमा) शामिल हैं।
इस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे शहतूत के पौधों का रोपण बढ़ाना और शहतूत आधारित रेशम उत्पादन की संभावनाओं का विस्तार करना है। इससे शहतूत की उपलब्धता बढ़ाने के साथ रेशम उत्पादन को प्रोत्साहन देने के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
इस अवसर पर कृषि आधारित शहतूत वृक्षारोपण मॉडल की भी जानकारी दी गई। डॉ. पवन सैनी ने बताया कि इस मॉडल में वृक्षीय पद्धति से शहतूत के पौधे लगाए जाते हैं और उनकी कतारों के बीच उपलब्ध भूमि पर अंतःफसली खेती को प्रोत्साहित किया जाता है। इससे भूमि का बेहतर उपयोग करने और शहतूत वृक्षारोपण के साथ कृषि गतिविधियों को बढ़ावा देने की संभावनाएं बनती हैं।
तकनीकी भ्रमण के दौरान केंद्र में किए जा रहे अनुसंधान कार्यों और विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से रेशम उत्पादन को अधिक वैज्ञानिक, प्रभावी एवं उपयोगी बनाने के प्रयासों पर जानकारी साझा की गई।

