वसुंधरा ताल में स्थापित हुई ग्लेशियल झील की पहली अर्ली वार्निंग सिस्टम, अब सैटेलाइट से मिलेगी खतरे की सूचना

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वसुंधरा ताल में स्थापित हुई ग्लेशियल झील की पहली अर्ली वार्निंग सिस्टम, अब सैटेलाइट से मिलेगी खतरे की सूचना

मुख्यमंत्री धामी के निर्देश पर अभियान पूरा, झील के जलस्तर, मौसम, बर्फ और भू-गतिविधियों पर रखी जाएगी नजर

देहरादून। उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न होने वाली संभावित आपदाओं की निगरानी और समय रहते चेतावनी जारी करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है। चमोली जनपद के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित वसुंधरा ताल में पहली बार ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) के संभावित खतरों की निगरानी के लिए अत्याधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर संचालित इस अभियान को वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल ने पूरा कर लिया है। अभियान दल के लौटने पर सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) में दल का स्वागत किया।

उच्च हिमालयी क्षेत्र की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और चुनौतीपूर्ण मौसम के बीच विभिन्न अत्याधुनिक सेंसर स्थापित किए गए हैं। इस प्रणाली से झील के जलस्तर, मौसम, बर्फ की स्थिति और आसपास होने वाली संभावित भू-गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी। इससे असामान्य परिस्थितियों की समय रहते पहचान कर संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों में चेतावनी जारी करने में मदद मिलेगी। इससे पहले 29 सितंबर को मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने अभियान दल को रवाना किया था।

सैटेलाइट तकनीक से पहुंचेगा डेटा

वसुंधरा ताल में मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता नहीं होने के कारण पूर्व चेतावनी प्रणाली में इरिडियम उपग्रह संचार तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसके माध्यम से सेंसरों से प्राप्त आंकड़े सीबीआरआई रुड़की और यूएसडीएमए में स्थापित डैशबोर्ड तक पहुंचेंगे। सामान्य परिस्थितियों में सेंसर प्रत्येक दो घंटे में आंकड़े भेजेंगे, जबकि आपातकालीन स्थिति में निर्धारित अंतराल की प्रतीक्षा किए बिना तत्काल डेटा भेजने की व्यवस्था की गई है।

अभियान दल ने वापसी से पहले डेटा संचार प्रणाली का परीक्षण भी किया। अधिकारियों के अनुसार, सेंसरों से प्राप्त आंकड़े अपेक्षा के अनुरूप दोनों केंद्रों तक पहुंच रहे हैं। इससे दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में भी झील की स्थिति की नियमित निगरानी संभव हो सकेगी।

मौसम से लेकर बर्फ की गहराई तक पर नजर

पूर्व चेतावनी प्रणाली में हवा की गति एवं दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, वायु तापमान और वायुदाब मापने के लिए ऑल-इन-वन मौसम सेंसर स्थापित किया गया है। झील के जलस्तर की निगरानी के लिए फ्लोटिंग और सबमर्ज्ड वाटर लेवल सेंसर लगाए गए हैं। संभावित बाढ़ से जुड़ी तात्कालिक कंपन, झुकाव और भू-गतिविधियों की निगरानी के लिए दो एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर भी स्थापित किए गए हैं।

इसके अतिरिक्त हिमस्खलन से संबंधित गतिविधियों की निगरानी के लिए एक अन्य एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर लगाया गया है। बर्फ की गहराई मापने के लिए स्नो डेप्थ सेंसर, बर्फ की सतह के नीचे अलग-अलग गहराइयों पर तापमान मापने के लिए सात तापमान सेंसर और झील की सतह के तापमान की निगरानी के लिए एक अतिरिक्त सेंसर लगाया गया है। इन उपकरणों से मिलने वाले आंकड़ों के विश्लेषण से झील और उसके आसपास होने वाले बदलावों को समझने में सहायता मिलेगी।

38.50 मीटर गहरी है वसुंधरा ताल

केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की के वैज्ञानिक एवं अभियान दल के प्रमुख डॉ. डीपी कानूनगो के अनुसार, वसुंधरा ताल की गहराई लगभग 38.50 मीटर, चौड़ाई 600 मीटर और लंबाई 900 मीटर है। अभियान के दौरान सेंसर और संचार प्रणाली के माध्यम से आंकड़ों के आदान-प्रदान का सत्यापन किया गया। पूर्व के आंकड़ों और वर्तमान स्थिति के आधार पर झील के आकार में कोई विशेष बदलाव नहीं देखा गया है।

उन्होंने बताया कि उपकरणों की स्थापना के लिए ऐसे स्थान का चयन किया गया, जहां भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी गतिविधियों का जोखिम बेहद कम है। उच्च हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम और उपकरणों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पूरी व्यवस्था तैयार की गई है।

सौर ऊर्जा से चलेगी प्रणाली, 10 दिन का बैकअप

दुर्गम क्षेत्र में निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सौर पैनल और बैटरी की व्यवस्था की गई है। प्रणाली में 280 एम्पियर क्षमता की बैटरी लगाई गई है, जो पर्याप्त धूप नहीं मिलने की स्थिति में लगभग 10 दिनों तक बैकअप देने में सक्षम है। इससे प्रतिकूल मौसम में भी उपकरणों के संचालन को जारी रखने में मदद मिलेगी।

उपकरणों की स्थापना के लिए स्टील के मॉड्यूलर डिजाइन पर आधारित फाउंडेशन बनाया गया है। इसमें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री और पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है तथा सीमेंट का प्रयोग नहीं किया गया है। क्षेत्र में हवा की गति लगभग 15 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है, जबकि फाउंडेशन का डिजाइन 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक की हवा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

आपदा प्रबंधन को वैज्ञानिक आधार देने पर जोर

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वसुंधरा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना के प्रथम चरण की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न संभावित खतरों की समय रहते पहचान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और संस्थागत समन्वय के माध्यम से राज्य की आपदा प्रबंधन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वसुंधरा ताल में स्थापित प्रणाली उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जोखिमों की निगरानी, समयबद्ध चेतावनी और संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। राज्य सरकार वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से आपदा प्रबंधन में आधुनिक तकनीकों के उपयोग को लगातार प्रोत्साहित कर रही है।

आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने इसे ग्लेशियल झीलों की निगरानी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने कहा कि इस प्रणाली से राज्य की आपदा पूर्व तैयारी को तकनीकी और वैज्ञानिक आधार पर मजबूत करने में मदद मिलेगी।

सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने बताया कि यूएसडीएमए ने राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत यह अभियान संचालित किया। इसमें सीबीआरआई रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिकों एवं तकनीकी विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अभियान के लिए यूएसडीएमए ने आवश्यक समन्वय, लॉजिस्टिक सहायता और संचार उपकरण उपलब्ध कराए। राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) ने भी सहयोग दिया।

इस अवसर पर सीबीआरआई रुड़की के निदेशक प्रो. आर. प्रदीप कुमार, यूएसडीएमए के अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं क्रियान्वयन डीआईजी राजकुमार नेगी, यूएलएमएमसी के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार सहित विभिन्न वैज्ञानिक एवं तकनीकी विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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